॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.32.9
क्ष्माम्भोऽनलानिलवियन्मनइन्द्रियार्थ-
भूतादिभिः परिवृतं प्रतिसञ्जिहीर्षुः१।
अव्याकृतं विशति यर्हि गुणत्रयात्मा
कालं पराख्यमनुभूय परः स्वयम्भूः॥ ९
kṣmāmbho'nalānilaviyanmanaïndriyārtha-
bhūtādibhiḥ parivṛtaṃ pratisañjihīrṣuḥ|
avyākṛtaṃ viśati yarhi guṇatrayātmā
kālaṃ parākhyamanubhūya paraḥ svayambhūḥ|| 9
अर्थ
जिस समय देवतादिसे श्रेष्ठ ब्रह्माजी अपने द्विपरार्द्धकालके अधिकारको भोगकर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, इन्द्रिय, उनके विषय (शब्दादि) और अहंकारादिके सहित सम्पूर्ण विश्वका संहार करनेकी इच्छासे त्रिगुणात्मिका प्रकृतिके साथ एकरूप होकर निर्विशेष परमात्मामें लीन हो जाते हैं, उस समय प्राण और मनको जीते हुए वे विरक्त योगिगण भी देह त्यागकर उन भगवान् ब्रह्माजीमें ही प्रवेश करते हैं और फिर उन्हींके साथ परमानन्दस्वरूप पुराणपुरुष परब्रह्ममें लीन हो जाते हैं। इससे पहले वे भगवान्में लीन नहीं हुए; क्योंकि अबतक उनमें अहंकार शेष था॥ ९-१०॥✎ 345 346
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—जिघृक्षुः।