॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.32.29
यथा महानहंरूपस्त्रिवृत्पञ्चविधः स्वराट्।
एकादशविधस्तस्य वपुरण्डं जगद्यतः॥ २९
yathā mahānahaṃrūpastrivṛtpañcavidhaḥ svarāṭ|
ekādaśavidhastasya vapuraṇḍaṃ jagadyataḥ|| 29
अर्थ
जिस प्रकार एक ही परब्रह्म महत्तत्त्व, वैकारिक, राजस और तामस—तीन प्रकारका अहंकार, पंचमहाभूत एवं ग्यारह इन्द्रियरूप बन गया और फिर वही स्वयंप्रकाश इनके संयोगसे जीव कहलाया, उसी प्रकार उस जीवका शरीररूप यह ब्रह्माण्ड भी वस्तुतः ब्रह्म ही है, क्योंकि ब्रह्मसे ही इसकी उत्पत्ति हुई है॥ २९॥