श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

एतावानेव योगेन समग्रेणेह योगिनः।

युज्यतेऽभिमतो ह्यर्थो यदसङ्गस्तु कृत्स्नशः॥ २७

etāvāneva yogena samagreṇeha yoginaḥ|

yujyate'bhimato hyartho yadasaṅgastu kṛtsnaśaḥ|| 27

अर्थ

सम्पूर्ण संसारमें आसक्तिका अभाव हो जाना—बस, यही योगियोंके सब प्रकारके योगसाधनका एकमात्र अभीष्ट फल है॥ २७॥

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