॥ श्रीहरिः ॥
एतावानेव योगेन समग्रेणेह योगिनः।
युज्यतेऽभिमतो ह्यर्थो यदसङ्गस्तु कृत्स्नशः॥ २७
etāvāneva yogena samagreṇeha yoginaḥ|
yujyate'bhimato hyartho yadasaṅgastu kṛtsnaśaḥ|| 27
अर्थ
सम्पूर्ण संसारमें आसक्तिका अभाव हो जाना—बस, यही योगियोंके सब प्रकारके योगसाधनका एकमात्र अभीष्ट फल है॥ २७॥
एतावानेव योगेन समग्रेणेह योगिनः।
युज्यतेऽभिमतो ह्यर्थो यदसङ्गस्तु कृत्स्नशः॥ २७
सम्पूर्ण संसारमें आसक्तिका अभाव हो जाना—बस, यही योगियोंके सब प्रकारके योगसाधनका एकमात्र अभीष्ट फल है॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.32.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 398) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/32/27/