श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

स तदैवात्मनाऽऽत्मानं निःसङ्गं समदर्शनम्।

हेयोपादेयरहितमारूढं पदमीक्षते॥ २५

sa tadaivātmanā''tmānaṃ niḥsaṅgaṃ samadarśanam|

heyopādeyarahitamārūḍhaṃ padamīkṣate|| 25

अर्थ

वस्तुतः सभी विषय भगवद्रूप होनेके कारण समान हैं। अतः जब इन्द्रियोंकी वृत्तियोंके द्वारा भी भगवद्भक्तका चित्त उनमें प्रिय-अप्रियरूप विषमताका अनुभव नहीं करता—सर्वत्र भगवान्‌का ही दर्शन करता है—उसी समय वह संगरहित, सबमें समानरूपसे स्थित, त्याग और ग्रहण करनेयोग्य, दोष और गुणोंसे रहित, अपनी महिमामें आरूढ़ अपने आत्माका ब्रह्मरूपसे साक्षात्कार करता है॥ २४-२५॥

यह अर्थ श्लोक 24–25 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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