श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

स चापि भगवद्धर्मात्काममूढः पराङ्मुखः।

यजते क्रतुभिर्देवान् पितॄंश्‍च श्रद्धयान्वितः॥ २

sa cāpi bhagavaddharmātkāmamūḍhaḥ parāṅmukhaḥ|

yajate kratubhirdevān pitṝṃśca śraddhayānvitaḥ|| 2

अर्थ

कपिलदेवजी कहते हैं—माताजी! जो पुरुष घरमें रहकर सकामभावसे गृहस्थके धर्मोंका पालन करता है और उनके फलस्वरूप अर्थ एवं कामका उपभोग करके फिर उन्हींका अनुष्ठान करता रहता है, वह तरह-तरहकी कामनाओंसे मोहित रहनेके कारण भगवद्धर्मोंसे विमुख हो जाता है और यज्ञोंद्वारा श्रद्धापूर्वक देवता तथा पितरोंकी ही आराधना करता रहता है॥ १-२॥

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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