ये लोग अर्थ, धर्म और कामके ही परायण होते हैं; इसलिये जिनके महान् पराक्रम अत्यन्त कीर्तनीय हैं, उन भवभयहारी श्रीमधुसूदनभगवान्की कथा-वार्ताओंसे तो ये विमुख ही रहते हैं॥ १८॥✎ 347
त्रैवर्गिकास्ते पुरुषा विमुखा हरिमेधसः।
कथायां कथनीयोरुविक्रमस्य मधुद्विषः॥ १८
ये लोग अर्थ, धर्म और कामके ही परायण होते हैं; इसलिये जिनके महान् पराक्रम अत्यन्त कीर्तनीय हैं, उन भवभयहारी श्रीमधुसूदनभगवान्की कथा-वार्ताओंसे तो ये विमुख ही रहते हैं॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.32.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 397) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/32/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#347 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीमधुसूदनभगवान् की → श्रीमधुसूदनभगवान्की