॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.31.34
तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मस्वसाधुषु।
सङ्ग न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च॥ ३४
teṣvaśānteṣu mūḍheṣu khaṇḍitātmasvasādhuṣu|
saṅga na kuryācchocyeṣu yoṣitkrīḍāmṛgeṣu ca|| 34
अर्थ
जिनके संगसे इसके सत्य, शौच (बाहर-भीतरकी पवित्रता), दया, वाणीका संयम, बुद्धि, धन-सम्पत्ति, लज्जा, यश, क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम तथा ऐश्वर्य आदि सभी सद्गुण नष्ट हो जाते हैं। उन अत्यन्त शोचनीय, स्त्रियोंके क्रीडामृग (खिलौना), अशान्त, मूढ़ और देहात्मदर्शी असत्पुरुषोंका संग कभी नहीं करना चाहिये॥ ३३-३४॥