श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.20

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

सोऽहं वसन्‍नपि विभो बहुदुःखवासं

गर्भान्‍न निर्जिगमिषे बहिरन्धकूपे।

यत्रोपयातमुपसर्पति देवमाया

मिथ्यामतिर्यदनु संसृतिचक्रमेतत्॥ २०

so'haṃ vasannapi vibho bahuduḥkhavāsaṃ

garbhānna nirjigamiṣe bahirandhakūpe|

yatropayātamupasarpati devamāyā

mithyāmatiryadanu saṃsṛticakrametat|| 20

अर्थ

भगवन्! इस अत्यन्त दुःखसे भरे हुए गर्भाशयमें यद्यपि मैं बड़े कष्टसे रह रहा हूँ, तो भी इससे बाहर निकलकर संसारमय अन्धकूपमें गिरनेकी मुझे बिलकुल इच्छा नहीं है; क्योंकि उसमें जानेवाले जीवको आपकी माया घेर लेती है। जिसके कारण उसकी शरीरमें अहंबुद्धि हो जाती है और उसके परिणाममें उसे फिर इस संसारचक्रमें ही पड़ना होता है॥ २०॥

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