॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.31.17
देह्यन्यदेहविवरे जठराग्निनासृग्
विण्मूत्रकूपपतितो भृशतप्तदेहः।
इच्छन्नितो विवसितुं गणयन् स्वमासान्
निर्वास्यते कृपणधीर्भगवन् कदा नु॥ १७
dehyanyadehavivare jaṭharāgnināsṛg
viṇmūtrakūpapatito bhṛśataptadehaḥ|
icchannito vivasituṃ gaṇayan svamāsān
nirvāsyate kṛpaṇadhīrbhagavan kadā nu|| 17
अर्थ
भगवन्! यह देहधारी जीव दूसरी (माताके) देहके उदरके भीतर मल, मूत्र और रुधिरके कुएँमें गिरा हुआ है, उसकी जठराग्निसे इसका शरीर अत्यन्त सन्तप्त हो रहा है। उससे निकलनेकी इच्छा करता हुआ यह अपने महीने गिन रहा है। भगवन्! अब इस दीनको यहाँसे कब निकाला जायगा?॥ १७॥