श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.15

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

यन्माययोरुगुणकर्मनिबन्धनेऽस्मिन्

सांसारिके पथि चरंस्तदभिश्रमेण।

नष्टस्मृतिः पुनरयं प्रवृणीत लोकं

युक्‍त्या कया महदनुग्रहमन्तरेण॥ १५

yanmāyayoruguṇakarmanibandhane'smin

sāṃsārike pathi caraṃstadabhiśrameṇa|

naṣṭasmṛtiḥ punarayaṃ pravṛṇīta lokaṃ

yuktyā kayā mahadanugrahamantareṇa|| 15

अर्थ

उन्हींकी मायासे अपने स्वरूपकी स्मृति नष्ट हो जानेके कारण यह जीव अनेक प्रकारके सत्त्वादि गुण और कर्मके बन्धनसे युक्त इस संसारमार्गमें तरह-तरहके कष्ट झेलता हुआ भटकता रहता है; अतः उन परमपुरुष परमात्माकी कृपाके बिना और किस युक्तिसे इसे अपने स्वरूपका ज्ञान हो सकता है॥ १५॥✎ 342

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #342 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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