॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.31.13
यस्त्वत्र बद्ध इव कर्मभिरावृतात्मा
भूतेन्द्रियाशयमयीमवलम्ब्य मायाम्।
आस्ते विशुद्धमविकारमखण्डबोध-
मातप्यमानहृदयेऽवसितं नमामि॥ १३
yastvatra baddha iva karmabhirāvṛtātmā
bhūtendriyāśayamayīmavalambya māyām|
āste viśuddhamavikāramakhaṇḍabodha-
mātapyamānahṛdaye'vasitaṃ namāmi|| 13
अर्थ
जो मैं(जीव) इस माताके उदरमें देह, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूपा मायाका आश्रय कर पुण्य-पापरूप कर्मोंसे आच्छादित रहनेके कारण बद्धकी तरह हूँ, वही मैं यहीं अपने सन्तप्त हृदयमें प्रतीत होनेवाले उन विशुद्ध (उपाधिरहित), अविकारी और अखण्ड बोधस्वरूप परमात्माको नमस्कार करता हूँ॥ १३॥✎ 342