श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.10

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

आरभ्य सप्तमान्मासाल्लब्धबोधोऽपि वेपितः।

नैकत्रास्ते सूतिवातैर्विष्ठाभूरिव सोदरः॥ १०

ārabhya saptamānmāsāllabdhabodho'pi vepitaḥ|

naikatrāste sūtivātairviṣṭhābhūriva sodaraḥ|| 10

अर्थ

सातवाँ महीना आरम्भ होनेपर उसमें ज्ञान-शक्तिका भी उन्मेष हो जाता है; परन्तु प्रसूतिवायुसे चलायमान रहनेके कारण वह उसी उदरमें उत्पन्‍न हुए विष्ठाके कीड़ोंके समान एक स्थानपर नहीं रह सकता॥ १०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें