श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.8

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

आक्षिप्तात्मेन्द्रियः स्त्रीणामसतीनां च मायया।

रहोरचितयाऽऽलापैः शिशूनां कलभाषिणाम्॥ ८

ākṣiptātmendriyaḥ strīṇāmasatīnāṃ ca māyayā|

rahoracitayā''lāpaiḥ śiśūnāṃ kalabhāṣiṇām|| 8

अर्थ

कुलटा स्त्रियोंके द्वारा एकान्तमें सम्भोगादिके समय प्रदर्शित किये हुए कपटपूर्ण प्रेममें तथा बालकोंकी मीठी-मीठी बातोंमें मन और इन्द्रियोंके फँस जानेसे गृहस्थ पुरुष घरके दुःखप्रधान कपटपूर्ण कर्मोंमें लिप्त हो जाता है। उस समय बहुत सावधानी करनेपर यदि उसे किसी दुःखका प्रतीकार करनेमें सफलता मिल जाती है, तो उसे ही वह सुख-सा मान लेता है॥ ८-९॥✎ 337 338

यह अर्थ श्लोक 8–9 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #337 शब्दोंके बीचका स्थान: सुख-सामान → सुख-सा मान
  • #338 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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