श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

नरकस्थोऽपि देहं वै न पुमांस्त्यक्तुमिच्छति।

नारक्यां निर्वृतौ सत्यां देवमायाविमोहितः॥ ५

narakastho'pi dehaṃ vai na pumāṃstyaktumicchati|

nārakyāṃ nirvṛtau satyāṃ devamāyāvimohitaḥ|| 5

अर्थ

यह भगवान्‌की मायासे ऐसा मोहित हो रहा है कि कर्मवश नारकी योनियोंमें जन्म लेनेपर भी वहाँके विष्ठा आदि भोगोंमें ही सुख माननेके कारण उसे भी छोड़ना नहीं चाहता॥ ५॥✎ 337 338

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #337 शब्दोंके बीचका स्थान: सुख-सामान → सुख-सा मान
  • #338 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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