श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

आदीपनं स्वगात्राणां वेष्टयित्वोल्मुकादिभिः।

आत्ममांसादनं क्‍वापि स्वकृत्तं परतोऽपि वा॥ २५

ādīpanaṃ svagātrāṇāṃ veṣṭayitvolmukādibhiḥ|

ātmamāṃsādanaṃ kvāpi svakṛttaṃ parato'pi vā|| 25

अर्थ

वहाँ उसके शरीरको धधकती लकड़ियों आदिके बीचमें डालकर जलाया जाता है, कहीं स्वयं और दूसरोंके द्वारा काट-काटकर उसे अपना ही मांस खिलाया जाता है॥ २५॥

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