॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.30.22
क्षुत्तृट्परीतोऽर्कदवानलानिलैः
सन्तप्यमानः पथि तप्तवालुके।
कृच्छ्रेण पृष्ठे कशया च ताडित-
श्चलत्यशक्तोऽपि निराश्रमोदके॥ २२
kṣuttṛṭparīto'rkadavānalānilaiḥ
santapyamānaḥ pathi taptavāluke|
kṛcchreṇa pṛṣṭhe kaśayā ca tāḍita-
ścalatyaśakto'pi nirāśramodake|| 22
अर्थ
भूख-प्यास उसे बेचैन कर देती है तथा घाम, दावानल और लूओंसे वह तप जाता है। ऐसी अवस्थामें जल और विश्रामस्थानसे रहित उस तप्तबालुकामय मार्गमें जब उसे एक पग आगे बढ़नेकी भी शक्ति नहीं रहती, यमदूत उसकी पीठपर कोड़े बरसाते हैं, तब बड़े कष्टसे उसे चलना ही पड़ता है॥ २२॥