जीव सुखकी अभिलाषासे जिस-जिस वस्तुको बड़े कष्टसे प्राप्त करता है, उसी-उसीको भगवान् काल विनष्ट कर देता है—जिसके लिये उसे बड़ा शोक होता है॥ २॥✎ 337338
यं यमर्थमुपादत्ते दुःखेन सुखहेतवे।
तं तं धुनोति भगवान् पुमाञ्छोचति यत्कृते॥ २
जीव सुखकी अभिलाषासे जिस-जिस वस्तुको बड़े कष्टसे प्राप्त करता है, उसी-उसीको भगवान् काल विनष्ट कर देता है—जिसके लिये उसे बड़ा शोक होता है॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.30.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 385) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/30/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)