यह अपने शोकातुर बन्धु-बान्धवोंसे घिरा हुआ पड़ा रहता है और मृत्युपाशके वशीभूत हो जानेसे उनके बुलानेपर भी नहीं बोल सकता॥ १७॥
शयानः परिशोचद्भिः परिवीतः स्वबन्धुभिः।
वाच्यमानोऽपि न ब्रूते कालपाशवशं गतः॥ १७
यह अपने शोकातुर बन्धु-बान्धवोंसे घिरा हुआ पड़ा रहता है और मृत्युपाशके वशीभूत हो जानेसे उनके बुलानेपर भी नहीं बोल सकता॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.30.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 386) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/30/17/