श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.3.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

उत्तरायां धृतः पूरोर्वंशः साध्वभिमन्युना।

स वै द्रौण्यस्त्रसंछिन्‍नः पुनर्भगवता धृतः॥ १७

uttarāyāṃ dhṛtaḥ pūrorvaṃśaḥ sādhvabhimanyunā|

sa vai drauṇyastrasaṃchinnaḥ punarbhagavatā dhṛtaḥ|| 17

अर्थ

उत्तराके उदरमें जो अभिमन्युने पूरुवंशका बीज स्थापित किया था, वह भी अश्‍वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे नष्ट-सा हो चुका था; किन्तु भगवान्‌ने उसे बचा लिया॥ १७॥✎ 203 204 205

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #203 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #204 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #205 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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