जो पुरुष विषय, यश और ऐश्वर्यकी कामनासे प्रतिमादिमें मेरा भेदभावसे पूजन करता है, वह राजस भक्त है॥ ९॥✎ 334
विषयानभिसन्धाय यश ऐश्वर्यमेव वा।
अर्चादावर्चयेद्यो मां पृथग्भावः स राजसः॥ ९
जो पुरुष विषय, यश और ऐश्वर्यकी कामनासे प्रतिमादिमें मेरा भेदभावसे पूजन करता है, वह राजस भक्त है॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 380) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/29/9/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#334 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने