श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.38

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

योऽन्तः प्रविश्य भूतानि भूतैरत्त्यखिलाश्रयः।

स विष्ण्वाख्योऽधियज्ञोऽसौ कालः कलयतां प्रभुः॥ ३८

yo'ntaḥ praviśya bhūtāni bhūtairattyakhilāśrayaḥ|

sa viṣṇvākhyo'dhiyajño'sau kālaḥ kalayatāṃ prabhuḥ|| 38

अर्थ

जो सबका आश्रय होनेके कारण समस्त प्राणियोंमें अनुप्रविष्ट होकर भूतोंद्वारा ही उनका संहार करता है, वह जगत‍्का शासन करनेवाले ब्रह्मादिका भी प्रभु भगवान् काल ही यज्ञोंका फल देनेवाला विष्णु है॥ ३८॥✎ 336

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #336 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें