sa viṣṇvākhyo'dhiyajño'sau kālaḥ kalayatāṃ prabhuḥ|| 38
अर्थ
जो सबका आश्रय होनेके कारण समस्त प्राणियोंमें अनुप्रविष्ट होकर भूतोंद्वारा ही उनका संहार करता है, वह जगत्का शासन करनेवाले ब्रह्मादिका भी प्रभु भगवान् काल ही यज्ञोंका फल देनेवाला विष्णु है॥ ३८॥✎ 336
योऽन्तः प्रविश्य भूतानि भूतैरत्त्यखिलाश्रयः।
स विष्ण्वाख्योऽधियज्ञोऽसौ कालः कलयतां प्रभुः॥ ३८
जो सबका आश्रय होनेके कारण समस्त प्राणियोंमें अनुप्रविष्ट होकर भूतोंद्वारा ही उनका संहार करता है, वह जगत्का शासन करनेवाले ब्रह्मादिका भी प्रभु भगवान् काल ही यज्ञोंका फल देनेवाला विष्णु है॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 384) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/29/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#336 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को