तात्पर्य जाननेवालोंसे संशय निवारण करनेवाले, उनसे भी अपने वर्णाश्रमोचित धर्मका पालन करनेवाले तथा उनसे भी आसक्तिका त्याग और अपने धर्मका निष्कामभावसे आचरण करनेवाले श्रेष्ठ हैं॥ ३२॥
अर्थज्ञात्संशयच्छेत्ता ततः श्रेयान् स्वकर्मकृत्।
मुक्तसङ्गस्ततो भूयानदोग्धा धर्ममात्मनः॥ ३२
तात्पर्य जाननेवालोंसे संशय निवारण करनेवाले, उनसे भी अपने वर्णाश्रमोचित धर्मका पालन करनेवाले तथा उनसे भी आसक्तिका त्याग और अपने धर्मका निष्कामभावसे आचरण करनेवाले श्रेष्ठ हैं॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 383) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/29/32/