श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

रूपभेदविदस्तत्र१ ततश्चोभयतोदतः।

तेषां बहुपदाः श्रेष्ठाश्‍चतुष्पाद२स्ततो द्विपात्॥ ३०

rūpabhedavidastatra tataścobhayatodataḥ|

teṣāṃ bahupadāḥ śreṣṭhāścatuṣpādastato dvipāt|| 30

अर्थ

उनसे भी रूपका अनुभव करनेवाले (काकादि) उत्तम हैं और उनकी अपेक्षा जिनके ऊपर-नीचे दोनों ओर दाँत होते हैं, वे जीव श्रेष्ठ हैं। उनमें भी बिना पैरवालोंसे बहुत-से चरणोंवाले श्रेष्ठ हैं तथा बहुत चरणोंवालोंसे चार चरणवाले और चार चरणवालोंसे भी दो चरणवाले मनुष्य श्रेष्ठ हैं॥ ३०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—विदस्तेभ्यस्ततश्‍चोभयवेदिनः।

    (मुद्रित पृष्ठ 383)
  2. २

    प्रा० पा०—पादास्ततो।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 383)

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