श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

जीवाःश्रेष्ठा ह्यजीवानां ततः प्राणभृतः शुभे।

ततः सचित्ताः प्रवरास्ततश्चेन्द्रियवृत्तयः॥ २८

jīvāḥśreṣṭhā hyajīvānāṃ tataḥ prāṇabhṛtaḥ śubhe|

tataḥ sacittāḥ pravarāstataścendriyavṛttayaḥ|| 28

अर्थ

माताजी! पाषाणादि अचेतनोंकी अपेक्षा वृक्षादि जीव श्रेष्ठ हैं, उनसे साँस लेनेवाले प्राणी श्रेष्ठ हैं, उनमें भी मनवाले प्राणी उत्तम और उनसे इन्द्रियकी वृत्तियोंसे युक्त प्राणी श्रेष्ठ हैं। सेन्द्रिय प्राणियोंमें भी केवल स्पर्शका अनुभव करनेवालोंकी अपेक्षा रसका ग्रहण कर सकनेवाले मत्स्यादि उत्कृष्ट हैं तथा रसवेत्ताओंकी अपेक्षा गन्धका अनुभव करनेवाले (भ्रमरादि) और गन्धका ग्रहण करनेवालोंसे भी शब्दका ग्रहण करनेवाले (सर्पादि) श्रेष्ठ हैं॥ २८-२९॥

यह अर्थ श्लोक 28–29 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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