श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

आध्यात्मिकानुश्रवणान्‍नामसङ्कीर्तनाच्च मे।

आर्जवेनार्यसङ्गेन निरहंक्रियया तथा॥ १८

ādhyātmikānuśravaṇānnāmasaṅkīrtanācca me|

ārjavenāryasaṅgena nirahaṃkriyayā tathā|| 18

अर्थ

निष्कामभावसे श्रद्धापूर्वक अपने नित्य-नैमित्तिक कर्तव्योंका पालन कर, नित्यप्रति हिंसारहित उत्तम क्रियायोगका अनुष्ठान करने, मेरी प्रतिमाका दर्शन, स्पर्श, पूजा, स्तुति और वन्दना करने, प्राणियोंमें मेरी भावना करने, धैर्य और वैराग्यके अवलम्बन, महापुरुषोंका मान, दीनोंपर दया और समान स्थितिवालोंके प्रति मित्रताका व्यवहार करने, यम-नियमोंका पालन, अध्यात्मशास्त्रोंका श्रवण और मेरे नामोंका उच्चस्वरसे कीर्तन करनेसे तथा मनकी सरलता, सत्पुरुषोंके संग और अहंकारके त्यागसे मेरे धर्मोंका (भागवतधर्मोंका) अनुष्ठान करनेवाले भक्त पुरुषका चित्त अत्यन्त शुद्ध होकर मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे अनायास ही मुझमें लग जाता है॥ १५—१९॥

यह व्याख्या श्लोक 3.29.15 से 3.29.19 तककी एक साथ है।

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