श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत।

दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः॥ १३

sālokyasārṣṭisāmīpyasārūpyaikatvamapyuta|

dīyamānaṃ na gṛhṇanti vinā matsevanaṃ janāḥ|| 13

अर्थ

ऐसे निष्काम भक्त, दिये जानेपर भी, मेरी सेवाको छोड़कर सालोक्य१, सार्ष्टि,२ सामीप्य,३ सारूप्य४ और सायुज्य५ मोक्षतक नहीं लेते—॥ १३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    भगवान्‌के नित्यधाममें निवास,

    (मुद्रित पृष्ठ 381)
  2. २

    भगवान्‌के समान ऐश्‍वर्यभोग,

    (मुद्रित पृष्ठ 381)
  3. ३

    भगवान्‌की नित्यसमीपता,

    (मुद्रित पृष्ठ 381)
  4. ४

    भगवान्‌का-सा रूप और

    (मुद्रित पृष्ठ 381)
  5. ५

    भगवान्‌के विग्रहमें समा जाना, उनसे एक हो जाना या ब्रह्मरूप प्राप्त कर लेना।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 381)

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