श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.11

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

मद‍्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये।

मनोगतिरविच्छिन्‍ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥ ११

madguṇaśrutimātreṇa mayi sarvaguhāśaye|

manogatiravicchinnā yathā gaṅgāmbhaso'mbudhau|| 11

अर्थ

जिस प्रकार गंगाका प्रवाह अखण्डरूपसे समुद्रकी ओर बहता रहता है, उसी प्रकार मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे मनकी गतिका तैलधारावत् अविच्छिन्‍नरूपसे मुझ सर्वान्तर्यामीके प्रति हो जाना तथा मुझ पुरुषोत्तममें निष्काम और अनन्य प्रेम होना—यह निर्गुण भक्तियोगका लक्षण कहा गया है॥ ११-१२॥

यह अर्थ श्लोक 11–12 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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