श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.7

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

एतैरन्यैश्‍च पथिभिर्मनो दुष्टमसत्पथम्।

बुद्ध्या युंजीत शनकैर्जितप्राणो ह्यतन्द्रितः॥ ७

etairanyaiśca pathibhirmano duṣṭamasatpatham|

buddhyā yuṃjīta śanakairjitaprāṇo hyatandritaḥ|| 7

अर्थ

इनसे तथा व्रत-दानादि दूसरे साधनोंसे भी सावधानीके साथ प्राणोंको जीतकर बुद्धिके द्वारा अपने कुमार्गगामी दुष्ट चित्तको धीरे-धीरे एकाग्र करे, परमात्माके ध्यानमें लगावे॥ ७॥✎ 325

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #325 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें