श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.43

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

स्वयोनिषु यथा ज्योतिरेकं नाना प्रतीयते।

योनीनां गुणवैषम्यात्तथाऽऽत्मा प्रकृतौ स्थितः॥ ४३

svayoniṣu yathā jyotirekaṃ nānā pratīyate|

yonīnāṃ guṇavaiṣamyāttathā''tmā prakṛtau sthitaḥ|| 43

अर्थ

जिस प्रकार एक ही अग्‍नि अपने पृथक्-पृथक् आश्रयोंमें उनकी विभिन्‍नताके कारण भिन्‍न-भिन्‍न आकारका दिखायी देता है, उसी प्रकार देव-मनुष्यादि शरीरोंमें रहनेवाला एक ही आत्मा अपने आश्रयोंके गुण-भेदके कारण भिन्‍न-भिन्‍न प्रकारका भासता है॥ ४३॥✎ 332 333

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #332 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #333 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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