श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.37

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

देहं च तं न चरमः स्थितमुत्थितं वा

सिद्धो विपश्यति यतोऽध्यगमत्स्वरूपम्।

दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं

वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्धः॥ ३७

dehaṃ ca taṃ na caramaḥ sthitamutthitaṃ vā

siddho vipaśyati yato'dhyagamatsvarūpam|

daivādupetamatha daivavaśādapetaṃ

vāso yathā parikṛtaṃ madirāmadāndhaḥ|| 37

अर्थ

जिस प्रकार मदिराके मदसे मतवाले पुरुषको अपनी कमरपर लपेटे हुए वस्त्रके रहने या गिरनेकी कुछ भी सुधि नहीं रहती, उसी प्रकार चरमावस्थाको प्राप्त हुए सिद्ध पुरुषको भी अपनी देहके बैठने-उठने अथवा दैववश कहीं जाने या लौट आनेके विषयमें कुछ भी ज्ञान नहीं रहता; क्योंकि वह अपने परमानन्दमय स्वरूपमें स्थित है॥ ३७॥✎ 330 331

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #330 शब्दोंके बीचका स्थान: हुएसिद्ध → हुए सिद्ध
  • #331 शब्दोंके बीचका स्थान: सुधिनहीं → सुधि नहीं

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