श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.34

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावो

भक्‍त्या द्रवद‍्धृदय उत्पुलकः प्रमोदात्।

औत्कण्ठ्यबाष्पकलया मुहुरर्द्यमान-

स्तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते॥ ३४

evaṃ harau bhagavati pratilabdhabhāvo

bhaktyā dravaddhṛdaya utpulakaḥ pramodāt|

autkaṇṭhyabāṣpakalayā muhurardyamāna-

staccāpi cittabaḍiśaṃ śanakairviyuṅkte|| 34

अर्थ

इस प्रकारके ध्यानके अभ्याससे साधकका श्रीहरिमें प्रेम हो जाता है, उसका हृदय भक्तिसे द्रवित हो जाता है, शरीरमें आनन्दातिरेकके कारण रोमांच होने लगता है, उत्कण्ठाजनित प्रेमाश्रुओंकी धारामें वह बारंबार अपने शरीरको नहलाता है और फिर मछली पकड़नेके काँटेके समान श्रीहरिको अपनी ओर आकर्षित करनेके साधनरूप अपने चित्तको भी धीरे-धीरे ध्येय वस्तुसे हटा लेता है॥ ३४॥✎ 330 331

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #330 शब्दोंके बीचका स्थान: हुएसिद्ध → हुए सिद्ध
  • #331 शब्दोंके बीचका स्थान: सुधिनहीं → सुधि नहीं

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