श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

वक्षोऽधिवासमृषभस्य महाविभूतेः

पुंसां मनोनयननिर्वृतिमादधानम्।

कण्ठं च कौस्तुभमणेरधिभूषणार्थं

कुर्यान्मनस्यखिललोकनमस्कृतस्य ॥ २६

vakṣo'dhivāsamṛṣabhasya mahāvibhūteḥ

puṃsāṃ manonayananirvṛtimādadhānam|

kaṇṭhaṃ ca kaustubhamaṇeradhibhūṣaṇārthaṃ

kuryānmanasyakhilalokanamaskṛtasya || 26

अर्थ

इसके पश्चात् पुरुषोत्तमभगवान्‌के वक्षःस्थलका ध्यान करे, जो महालक्ष्मीका निवासस्थान और लोगोंके मन एवं नेत्रोंको आनन्द देनेवाला है। फिर सम्पूर्ण लोकोंके वन्दनीय भगवान्‌के गलेका चिन्तन करे, जो मानो कौस्तुभमणिको भी सुशोभित करनेके लिये ही उसे धारण करता है॥ २६॥

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