॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.28.2
स्वधर्माचरणं शक्त्या विधर्माच्च निवर्तनम्।
दैवाल्लब्धेन सन्तोष आत्मविच्चरणार्चनम्॥ २
svadharmācaraṇaṃ śaktyā vidharmācca nivartanam|
daivāllabdhena santoṣa ātmaviccaraṇārcanam|| 2
अर्थ
यथाशक्ति शास्त्रविहित स्वधर्मका पालन करना तथा शास्त्रविरुद्ध आचरणका परित्याग करना, प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहना, आत्मज्ञानियोंके चरणोंकी पूजा करना,॥ २॥✎ 324