श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.15

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

मत्तद्विरेफकलया परीतं वनमालया।

परार्घ्यहारवलयकिरीटांगदनूपुरम् ॥ १५

mattadvirephakalayā parītaṃ vanamālayā|

parārghyahāravalayakirīṭāṃgadanūpuram || 15

अर्थ

वनमाला चरणोंतक लटकी हुई है, जिसके चारों ओर भौंरे सुगन्धसे मतवाले होकर मधुर गुंजार कर रहे हैं; अंग-प्रत्यंगमें महामूल्य हार, कंकण, किरीट, भुजबन्ध और नूपुर आदि आभूषण विराजमान हैं॥ १५॥✎ 327

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #327 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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