श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.27.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

ज्ञानेन दृष्टतत्त्वेन वैराग्येण बलीयसा।

तपोयुक्तेन योगेन तीव्रेणात्मसमाधिना॥ २२

jñānena dṛṣṭatattvena vairāgyeṇa balīyasā|

tapoyuktena yogena tīvreṇātmasamādhinā|| 22

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—माताजी! जिस प्रकार अग्‍निका उत्पत्तिस्थान अरणि अपनेसे ही उत्पन्‍न अग्‍निसे जलकर भस्म हो जाती है, उसी प्रकार निष्कामभावसे किये हुए स्वधर्मपालनद्वारा अन्तःकरण शुद्ध होनेसे बहुत समयतक भगवत्कथा-श्रवणद्वारा पुष्ट हुई मेरी तीव्र भक्तिसे, तत्त्वसाक्षात्कार करानेवाले ज्ञानसे, प्रबल वैराग्यसे, व्रतनियमादिके सहित किये हुए ध्यानाभ्याससे और चित्तकी प्रगाढ़ एकाग्रतासे पुरुषकी प्रकृति (अविद्या) दिन-रात क्षीण होती हुई धीरे-धीरे लीन हो जाती है॥ २१—२३॥✎ 323 1597

यह अर्थ श्लोक 21–23 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #323 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #1597 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ब्रह्मलोक-पर्यन्त → ब्रह्मलोकपर्यन्त

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