अतः जिनके आश्रयसे अकर्ता पुरुषको यह कर्मबन्धन प्राप्त हुआ है, उन प्रकृतिके गुणोंके रहते हुए उसे कैवल्यपद कैसे प्राप्त होगा?॥ १९॥
अकर्तुः कर्मबन्धोऽयं पुरुषस्य यदाश्रयः।
गुणेषु सत्सु प्रकृतेः कैवल्यं तेष्वतः कथम्॥ १९
अतः जिनके आश्रयसे अकर्ता पुरुषको यह कर्मबन्धन प्राप्त हुआ है, उन प्रकृतिके गुणोंके रहते हुए उसे कैवल्यपद कैसे प्राप्त होगा?॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.27.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 372) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/27/19/