देवहूतिने पूछा—प्रभो! पुरुष और प्रकृति दोनों ही नित्य और एक-दूसरेके आश्रयसे रहनेवाले हैं, इसलिये प्रकृति तो पुरुषको कभी छोड़ ही नहीं सकती॥ १७॥
पुरुषं प्रकृतिर्ब्रह्मन्न विमुञ्चति कर्हिचित्।
अन्योन्यापाश्रयत्वाच्च नित्यत्वादनयोः प्रभो॥ १७
देवहूतिने पूछा—प्रभो! पुरुष और प्रकृति दोनों ही नित्य और एक-दूसरेके आश्रयसे रहनेवाले हैं, इसलिये प्रकृति तो पुरुषको कभी छोड़ ही नहीं सकती॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.27.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 372) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/27/17/