श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.27.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

भूतसूक्ष्मेन्द्रियमनोबुद्ध्यादिष्विह निद्रया।

लीनेष्वसति यस्तत्र विनिद्रो निरहंक्रियः॥ १४

bhūtasūkṣmendriyamanobuddhyādiṣviha nidrayā|

līneṣvasati yastatra vinidro nirahaṃkriyaḥ|| 14

अर्थ

जिस प्रकार जलमें पड़ा हुआ सूर्यका प्रतिबिम्ब दीवालपर पड़े हुए अपने आभासके सम्बन्धसे देखा जाता है और जलमें दीखनेवाले प्रतिबिम्बसे आकाशस्थित सूर्यका ज्ञान होता है, उसी प्रकार वैकारिक आदि भेदसे तीन प्रकारका अहङ्कार देह, इन्द्रिय और मनमें स्थित अपने प्रतिबिम्बोंसे लक्षित होता है और फिर सत् परमात्माके प्रतिबिम्बयुक्त उस अहङ्कारके द्वारा सत्यज्ञानस्वरूप परमात्माका दर्शन होता है—जो सुषुप्तिके समय निद्रासे शब्दादि भूतसूक्ष्म, इन्द्रिय और मनबुद्धि आदिके अव्याकृतमें लीन हो जानेपर स्वयं जागता रहता है और सर्वथा अहंकारशून्य है॥ १२—१४॥

यह अर्थ श्लोक 12–14 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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