॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.26.71
यथा प्रसुप्तं पुरुषं प्राणेन्द्रियमनोधियः।
प्रभवन्ति विना येन नोत्थापयितुमोजसा॥ ७१
yathā prasuptaṃ puruṣaṃ prāṇendriyamanodhiyaḥ|
prabhavanti vinā yena notthāpayitumojasā|| 71
अर्थ
जिस प्रकार लोकमें प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि चित्तके अधिष्ठाता क्षेत्रज्ञकी सहायताके बिना सोये हुए प्राणीको अपने बलसे नहीं उठा सकते, उसी प्रकार विराट् पुरुषको भी वे क्षेत्रज्ञ परमात्माके बिना नहीं उठा सके॥ ७१॥