॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.26.48
तेजोगुणविशेषोऽर्थो यस्य तच्चक्षुरुच्यते।
अम्भोगुणविशेषोऽर्थो यस्य तद्रसनं विदुः।
भूमेर्गुणविशेषोऽर्थो यस्य स घ्राण उच्यते॥ ४८
tejoguṇaviśeṣo'rtho yasya taccakṣurucyate|
ambhoguṇaviśeṣo'rtho yasya tadrasanaṃ viduḥ|
bhūmerguṇaviśeṣo'rtho yasya sa ghrāṇa ucyate|| 48
अर्थ
तेजका विशेष गुण रूप जिसका विषय है, वह नेत्रेन्द्रिय है; जलका विशेष गुण रस जिसका विषय है, वह रसनेन्द्रिय है और पृथ्वीका विशेष गुण गन्ध जिसका विषय है, उसे घ्राणेन्द्रिय कहते हैं॥ ४८॥