श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.48

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

तेजोगुणविशेषोऽर्थो यस्य तच्चक्षुरुच्यते।

अम्भोगुणविशेषोऽर्थो यस्य तद्रसनं विदुः।

भूमेर्गुणविशेषोऽर्थो यस्य स घ्राण उच्यते॥ ४८

tejoguṇaviśeṣo'rtho yasya taccakṣurucyate|

ambhoguṇaviśeṣo'rtho yasya tadrasanaṃ viduḥ|

bhūmerguṇaviśeṣo'rtho yasya sa ghrāṇa ucyate|| 48

अर्थ

तेजका विशेष गुण रूप जिसका विषय है, वह नेत्रेन्द्रिय है; जलका विशेष गुण रस जिसका विषय है, वह रसनेन्द्रिय है और पृथ्वीका विशेष गुण गन्ध जिसका विषय है, उसे घ्राणेन्द्रिय कहते हैं॥ ४८॥

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