॥ श्रीहरिः ॥
रसमात्राद्विकुर्वाणादम्भसो दैवचोदितात्।
गन्धमात्रमभूत्तस्मात्पृथ्वी घ्राणस्तु गन्धगः॥ ४४
rasamātrādvikurvāṇādambhaso daivacoditāt|
gandhamātramabhūttasmātpṛthvī ghrāṇastu gandhagaḥ|| 44
अर्थ
इसके पश्चात् दैवप्रेरित रसस्वरूप जलके विकृत होनेपर उससे गन्धतन्मात्र हुआ और उससे पृथ्वी तथा गन्धको ग्रहण करानेवाली घ्राणेन्द्रिय प्रकट हुई॥ ४४॥
रसमात्राद्विकुर्वाणादम्भसो दैवचोदितात्।
गन्धमात्रमभूत्तस्मात्पृथ्वी घ्राणस्तु गन्धगः॥ ४४
इसके पश्चात् दैवप्रेरित रसस्वरूप जलके विकृत होनेपर उससे गन्धतन्मात्र हुआ और उससे पृथ्वी तथा गन्धको ग्रहण करानेवाली घ्राणेन्द्रिय प्रकट हुई॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 366) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/26/44/