उस सर्वव्यापक पुरुषने अपने पास लीला-विलासपूर्वक आयी हुई अव्यक्त और त्रिगुणात्मिका वैष्णवी मायाको स्वेच्छासे स्वीकार कर लिया॥ ४॥✎ 317
स एष प्रकृतिं सूक्ष्मां दैवीं गुणमयीं विभुः।
यदृच्छयैवोपगतामभ्यपद्यत लीलया॥ ४
उस सर्वव्यापक पुरुषने अपने पास लीला-विलासपूर्वक आयी हुई अव्यक्त और त्रिगुणात्मिका वैष्णवी मायाको स्वेच्छासे स्वीकार कर लिया॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 362) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#317 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने