स्पर्शोऽभवत्ततो वायुस्त्वक् स्पर्शस्य च संग्रहः॥ ३५
nabhasaḥ śabdatanmātrātkālagatyā vikurvataḥ|
sparśo'bhavattato vāyustvak sparśasya ca saṃgrahaḥ|| 35
अर्थ
फिर शब्दतन्मात्रके कार्य आकाशमें कालगतिसे विकार होनेपर स्पर्शतन्मात्र हुआ और उससे वायु तथा स्पर्शका ग्रहण करानेवाली त्वगिन्द्रिय (त्वचा) उत्पन्न हुई॥ ३५॥✎ 321
नभसः शब्दतन्मात्रात्कालगत्या विकुर्वतः।
स्पर्शोऽभवत्ततो वायुस्त्वक् स्पर्शस्य च संग्रहः॥ ३५
फिर शब्दतन्मात्रके कार्य आकाशमें कालगतिसे विकार होनेपर स्पर्शतन्मात्र हुआ और उससे वायु तथा स्पर्शका ग्रहण करानेवाली त्वगिन्द्रिय (त्वचा) उत्पन्न हुई॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 365) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)