श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

तैजसानीन्द्रियाण्येव क्रियाज्ञानविभागशः।

प्राणस्य हि क्रिया शक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशक्तिता॥ ३१

taijasānīndriyāṇyeva kriyājñānavibhāgaśaḥ|

prāṇasya hi kriyā śaktirbuddhervijñānaśaktitā|| 31

अर्थ

इन्द्रियाँ भी तैजस अहंकारका ही कार्य हैं। कर्म और ज्ञानके विभागसे उनके कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय दो भेद हैं। इनमें कर्म प्राणकी शक्ति है और ज्ञान बुद्धिकी॥ ३१॥

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