प्राणस्य हि क्रिया शक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशक्तिता॥ ३१
taijasānīndriyāṇyeva kriyājñānavibhāgaśaḥ|
prāṇasya hi kriyā śaktirbuddhervijñānaśaktitā|| 31
अर्थ
इन्द्रियाँ भी तैजस अहंकारका ही कार्य हैं। कर्म और ज्ञानके विभागसे उनके कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय दो भेद हैं। इनमें कर्म प्राणकी शक्ति है और ज्ञान बुद्धिकी॥ ३१॥
तैजसानीन्द्रियाण्येव क्रियाज्ञानविभागशः।
प्राणस्य हि क्रिया शक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशक्तिता॥ ३१
इन्द्रियाँ भी तैजस अहंकारका ही कार्य हैं। कर्म और ज्ञानके विभागसे उनके कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय दो भेद हैं। इनमें कर्म प्राणकी शक्ति है और ज्ञान बुद्धिकी॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 365) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/31/