लय-विक्षेपादि रहित तथा जगत्के अंकुररूप इस महत्तत्त्वने अपनेमें स्थित विश्वको प्रकट करनेके लिये अपने स्वरूपको आच्छादित करनेवाले प्रलयकालीन अन्धकारको अपने ही तेजसे पी लिया॥ २०॥
विश्वमात्मगतं व्यंजन् कूटस्थो जगदङ्कुरः।
स्वतेजसापिबत्तीव्रमात्मप्रस्वापनं तमः॥ २०
लय-विक्षेपादि रहित तथा जगत्के अंकुररूप इस महत्तत्त्वने अपनेमें स्थित विश्वको प्रकट करनेके लिये अपने स्वरूपको आच्छादित करनेवाले प्रलयकालीन अन्धकारको अपने ही तेजसे पी लिया॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 364) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/20/