इस प्रकार जो अपनी मायाके द्वारा सब प्राणियोंके भीतर जीवरूपसे और बाहर कालरूपसे व्याप्त हैं, वे भगवान् ही पचीसवें तत्त्व हैं॥ १८॥✎ 318
अन्तः पुरुषरूपेण कालरूपेण यो बहिः।
समन्वेत्येष सत्त्वानां भगवानात्ममायया॥ १८
इस प्रकार जो अपनी मायाके द्वारा सब प्राणियोंके भीतर जीवरूपसे और बाहर कालरूपसे व्याप्त हैं, वे भगवान् ही पचीसवें तत्त्व हैं॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 363) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#318 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने