श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तमित्यन्तरात्मकम्।

चतुर्धा लक्ष्यते भेदो वृत्त्या लक्षणरूपया॥ १४

mano buddhirahaṅkāraścittamityantarātmakam|

caturdhā lakṣyate bhedo vṛttyā lakṣaṇarūpayā|| 14

अर्थ

मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार—इन चारके रूपमें एक ही अन्तःकरण अपनी संकल्प, निश्‍चय, चिन्ता और अभिमानरूपा चार प्रकारकी वृत्तियोंसे लक्षित होता है॥ १४॥✎ 318

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #318 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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