श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.42

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

मद्भयाद्वाति वातोऽयं सूर्यस्तपति मद्भयात्।

वर्षतीन्द्रो दहत्यग्‍निर्मृत्युश्‍चरति मद्भयात्॥ ४२

madbhayādvāti vāto'yaṃ sūryastapati madbhayāt|

varṣatīndro dahatyagnirmṛtyuścarati madbhayāt|| 42

अर्थ

मेरे भयसे यह वायु चलती है, मेरे भयसे सूर्य तपता है, मेरे भयसे इन्द्र वर्षा करता और अग्‍नि जलाती है तथा मेरे ही भयसे मृत्यु अपने कार्यमें प्रवृत्त होता है॥ ४२॥

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