हरे! यह सब आप मुझे इस प्रकार समझाइये जिससे कि आपकी कृपासे मैं मन्दमति स्त्रीजाति भी इस दुर्बोध विषयको सुगमतासे समझ सकूँ॥ ३०॥
तदेतन्मे विजानीहि यथाहं मन्दधीर्हरे।
सुखं बुद्ध्येय दुर्बोधं योषा भवदनुग्रहात्॥ ३०
हरे! यह सब आप मुझे इस प्रकार समझाइये जिससे कि आपकी कृपासे मैं मन्दमति स्त्रीजाति भी इस दुर्बोध विषयको सुगमतासे समझ सकूँ॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.25.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 360) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/25/30/