श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.24

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

त एते साधवः साध्वि सर्वसंगविवर्जिताः२।

संगस्तेष्वथ ते प्रार्थ्यः संगदोषहरा हि ते॥ २४

ta ete sādhavaḥ sādhvi sarvasaṃgavivarjitāḥ|

saṃgasteṣvatha te prārthyaḥ saṃgadoṣaharā hi te|| 24

अर्थ

साध्वि! ऐसे-ऐसे सर्वसंगपरित्यागी महापुरुष ही साधु होते हैं, तुम्हें उन्हींके संगकी इच्छा करनी चाहिये; क्योंकि वे आसक्तिसे उत्पन्‍न सभी दोषोंको हर लेनेवाले हैं॥ २४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—विनिर्गताः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 359)

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